बस्ती शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही: पैसा जमा, फिर भी स्कूलों में क्यों नहीं पहुंची बिजली?
बस्ती: फाइलों में रोशन हुए स्कूल, हकीकत में 'अंधेरे' में कैद नौनिहाल! करोड़ों का भुगतान, दो साल का इंतजार: क्या मासूमों की पसीने की बूंदें भी सिस्टम को नहीं जगातीं? सरकारी 'अंधेरा': करोड़ों खर्चने के बाद भी नहीं जले बल्ब, उमस में दम तोड़ने को मजबूर भविष्य!
अजीत मिश्रा (खोजी)
प्रशासनिक लापरवाही: करोड़ों के भुगतान के बाद भी ‘अंधेरे’ में बस्ती के परिषदीय विद्यालय, बच्चे उमस में पसीने से तरबतर
- विद्युतीकरण के नाम पर सरकारी खेल: दो साल बाद भी बदहाल बस्ती के परिषदीय विद्यालय।
- जिम्मेदारों की नींद गहरी, स्कूलों में उमस का पहरा: करोड़ों का बजट कहां हुआ स्वाहा?
- बिना पंखे-रोशनी के शिक्षा: भीषण उमस में पढ़ने को मजबूर बस्ती के मासूम।
- बस्ती: क्या यही है ‘स्मार्ट स्कूल’ का सपना? दो साल से बिजली को तरस रहे स्कूल!
बस्ती। जनपद के परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा के उजले भविष्य के दावे सरकारी फाइलों में तो खूब चमक रहे हैं, लेकिन हकीकत में ये स्कूल आज भी अंधेरे और भीषण उमस की कैद में हैं। मार्च 2024 में करोड़ों रुपये का भुगतान होने के बावजूद, दो साल बाद भी विद्यालयों का विद्युतीकरण न हो पाना प्रशासनिक तंत्र की घोर लापरवाही और उदासीनता का जीता-जागता सबूत है।
कागजों पर बिजली, धरातल पर अंधेरा
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, 27 मार्च 2024 को विद्युत वितरण निगम को विद्यालयों में बिजली पहुँचाने के लिए ₹1.67 करोड़ की भारी-भरकम धनराशि हस्तांतरित की गई थी। उद्देश्य स्पष्ट था—विद्यालयों में वायरिंग और कनेक्शन के जरिए बच्चों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना। लेकिन, दो साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी यह धनराशि भ्रष्टाचार या सुस्ती की भेंट चढ़ गई है।
कप्तानगंज का ‘बटटूपुर’ मॉडल: एक बानगी
विकास खंड कप्तानगंज के उच्च प्राथमिक विद्यालय बटटूपुर का मामला इस तंत्र की विफलता को बयां करने के लिए काफी है। यहाँ लगभग ₹1.99 लाख का एस्टीमेट जमा करने और कार्यदायी संस्था को दस्तावेज सौंपने के बाद भी ‘बत्ती’ गुल है। 24 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज होने के बाद भी केवल कागजी खानापूर्ति की गई। विद्युत विभाग और कार्यदायी संस्था एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं, जबकि हकीकत में बच्चे आज भी बिना पंखे और रोशनी के दम घोंटू माहौल में पढ़ने को मजबूर हैं।
सवाल जो सिस्टम को कटघरे में खड़ा करते हैं:
- धनराशि कहां गई? जब मार्च 2024 में बजट जारी हो चुका था, तो दो वर्षों तक यह पैसा किन खातों की शोभा बढ़ाता रहा?
- जवाबदेही किसकी? क्या कार्यदायी संस्थाओं और विद्युत विभाग के बीच समन्वय का अभाव बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने का बहाना है?
- अप्रिय घटना का जिम्मेदार कौन? यदि बिना मानक के अधूरी वायरिंग या बिजली की जर्जर स्थिति के कारण कोई हादसा होता है, तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा?
बच्चों का भविष्य दांव पर
भीषण गर्मी और उमस के बीच, जहां सामान्य व्यक्ति का बैठना दूभर होता है, वहां हमारे नौनिहाल बिना पंखे के पढ़ाई करने को मजबूर हैं। यह न केवल शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि बच्चों के प्रति संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। अभिभावकों और स्थानीय नागरिकों का गुस्सा अब सड़कों पर उतरने लगा है।
समय आ गया है कि जिला प्रशासन इस मामले को महज एक शिकायत के रूप में न देखे, बल्कि उच्चस्तरीय जांच बैठाकर दोषी कार्यदायी संस्थाओं को ब्लैकलिस्ट करे और तत्काल प्रभाव से विद्युतीकरण कार्य पूरा कर मासूमों को राहत पहुंचाए।
क्या बस्ती के इन विद्यालयों में ‘उजाला’ देखने के लिए किसी और हादसे का इंतजार किया जा रहा है?



















